शिवा का अहंकार एक सच्ची कहानी

शिवा का अहंकार सच्ची कहानी

शिवा का अहंकार कहानी

शिवा का अहंकार सच्ची कहानी

कहानी

शिवा का अहंकार सच्ची कहानी

अन्य बुरे गुणों की भाती अहंकार भी मानव का ऐसा सत्रु है जो उसके पतन का कारन बनता है अपनी सकती बुद्धि ,जाती ,पद ,प्रतिष्ठा आदि का अहंकार ब्यक्ति को ले डूबता है। लंका के राजा रावण अपनी शिव भक्ति, शक्ति एवम वीरता पर अहंकार हो गया था ,इसलिए उसने अपने सामने किसी को कुछ नहीं समझा। उसी अहंकार के कारन उसने सीता जी का हरण कर श्री राम से शत्रुता की जो उसके विनाश का कारन बनी।
यह उसके अहंकार का ही दुस्परिडाम था,की महाज्ञानी और विद्वान होते हुए भी वह वास्तविकता को नहीं पहचान सका और अपने वंश के विनाश का कारन बना।

हिरणाकश्यप नाम का एक दैत्य ब्रम्भा जी से वरदान पाकर इतना अहंकारी ही गया था ,की स्वयं को ही भगवान समझने लगा था। जब उसके पुत्र प्रह्लाद ने उसे भगवान मानने से इंकार कर दिया तो उसने अपने ही पुत्र को मारने के अनेक असफल प्रयाश किये ,अंततः अहंकार ही उसकी मृत्यु का कारन बना।
मथुरा के राजा कंश को अपनी सकती पर अहंकार हो गया था इसी अहंकार के कारन उसने प्रजा पर तरह – तरह के अत्याचार किये और अंततः वही अहंकार उसे ले डूबा।
शिव जी के मन में भी एक बार इसी प्रकार का अहंकार प्रवेश कर गया था ,वे एक किले का निर्माण करवा रहे थे। किले के निर्माण में सैकड़ो मजदूर काम कर रहे थे शिव जी ने सोचा यदि मई इस किले का निर्माण न करवाता तो एक लोगो को आजीविका कैसे मिलती ,मेरे कारन ही इनकी आजीविका चल रही है तभी उधर से उनके गुरु समर्थ रामदास आ निकले ,वे शिव जी के हाव – भाव से ही समझ गए की उनके मन में अपने पद ,धन ,सम्पति का आदि का अहंकार उत्पन हो गया है। फिर भी उन्होंने इस सम्बद्ध के बार में कोई चर्चा नहीं की ,केवल इतना ही पूछा – शिवा क्या सोच रहे हो ,शिव जी ने उत्तर दिया -गुरु जी मई सोच रहा हु की यदि मैं यह किला न बनवाता तो इतने लोगो को खाना – पीना कहा से मिलता।

शिवा का अहंकार सच्ची कहानी


गुरु जी ने इधर – उधर देखा पास ही एक बड़ा सा पत्थर पड़ा था वे बोले शिवा उस पत्थर को उठा कर इधर लाना ,शिव जी ने कुछ मजदूरों को बुलवाया और उस पत्थर को अपने पास लाने के लिए कहा। अब गुरु जी ने आदेश दिया की इसे अब धीरे धीरे तुड़वाओ ,शिव जी ने उस पत्थर को मजदूरों से तोड़ने को कहा पत्थर के दो टुकड़े हो गए शिव जी कुछ समझ में नहीं आ रहा था की गुरु जी उस पत्थर को तुड़वाकर क्या बताना चाहते है। गुरु जी ने कहा अब इसके ऊपर वाला भाग हटवा दो ,शिव जी ने वैसा ही किया पत्थर के निचले भाग में छोटा सा छेद था जिसमे एक छोटी सी मेंढक बैठी थी पत्थर के ऊपर का भाग हटते ही वह उस छेद से कूदकर बाहर आ गयी।
गुरु जी ने कहा शिवा इस मेंढक को देख रहे हो ,जी गुरु जी इस मेंढक को भी तुम ही भोजन देते हो जैसे ही गुरु जी ने इतना कहा की शिव जी उन कहने का अर्थ समझ गए ,उन्होंने गुरु जी के पैर पकड़ लिए और बोले छमा करे गुरुदेव कुछ समय के लिए मेरा हिरदय अहंकार से भर गया था मैं स्वयं को इन मजदूरों का अणदाता समझने लगा था मैं भूल गया था की संसार में इस्वर ही सभी जीवो का पालन पोषण करता है ,मनुष्य नहीं।

शिव की कहानी –

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